NASA का Swift टेलीस्कोप धरती पर लौटा, 22 साल का मिशन खत्म

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वायुमंडल में जलते स्पेस टेलीस्कोप का ग्राफिक, NASA Swift टेलीस्कोप री-एंट्री

NASA का Swift टेलीस्कोप आखिरकार धरती के वायुमंडल में लौट आया। अमेरिकी स्पेस फोर्स के मुताबिक Neil Gehrels Swift Observatory ने 4 नवंबर को भारतीय समय के हिसाब से शाम करीब 6:09 बजे इंडोनेशिया के उत्तरी सुमात्रा के ऊपर वायुमंडल में प्रवेश किया, और इसके साथ ही 22 साल लंबे एक शानदार मिशन का अंत हो गया।

मुख्य बातें

  • री-एंट्री 4 नवंबर, 12:39 UTC (करीब 6:09 बजे शाम IST) पर उत्तरी सुमात्रा के ऊपर हुई।
  • 2004 में सिर्फ 2 साल के मिशन के लिए भेजा गया Swift करीब 22 साल काम करता रहा।
  • इसने 2,000 से ज़्यादा गामा-रे बर्स्ट और 1,400 से ज़्यादा सुपरनोवा देखे।
  • इसे ऊंची कक्षा में धकेलने का निजी रेस्क्यू मिशन नाकाम रहा था।

कहां गिरा और भारत से कितनी दूर

NASA के अपडेट के मुताबिक री-एंट्री की जगह करीब 3.4 डिग्री उत्तरी अक्षांश और 98.6 डिग्री पूर्वी देशांतर थी, यानी सुमात्रा का उत्तरी हिस्सा। हमारी गणना के हिसाब से ये जगह भारत के सबसे दक्षिणी छोर, ग्रेट निकोबार के इंदिरा पॉइंट से लगभग 650 किलोमीटर और पोर्ट ब्लेयर से करीब 1,100 किलोमीटर दूर है। यानी भारत की ज़मीन पर इसका कोई असर नहीं पड़ा।

करीब 1,450 किलो वज़नी इस यान का ज़्यादातर हिस्सा वायुमंडल की रगड़ से जलकर खत्म होने का अनुमान था। NASA ने माना है कि कुछ पुर्ज़े बच सकते हैं। पहले के आकलन में किसी इंसान को नुकसान का खतरा करीब 2,100 में 1 बताया गया था। अब तक ज़मीन पर मलबा मिलने या किसी नुकसान की कोई पुष्ट खबर नहीं है।

2 साल का प्लान, 22 साल का काम

Swift को नवंबर 2004 में गामा-रे बर्स्ट (GRB) पकड़ने के लिए लॉन्च किया गया था। ये ब्रह्मांड के सबसे ताकतवर धमाके माने जाते हैं, जो कुछ सेकंड में उतनी ऊर्जा छोड़ते हैं जितनी सूरज अरबों साल में छोड़ता है। Swift की खासियत थी उसकी तेज़ी: किसी धमाके का पता चलते ही वो खुद मुड़कर उस तरफ देखता और दुनिया की दूसरी वेधशालाओं को अलर्ट भेज देता।

मूल योजना सिर्फ 2 साल की थी, लेकिन यान ने करीब 22 साल यानी तय समय से 11 गुना ज़्यादा काम किया। इस दौरान इसने 2,000 से ज़्यादा GRB, 1,400 से ज़्यादा सुपरनोवा, ब्लैक होल वाली आकाशगंगाएं, तारों की एक्स-रे चमक और हमारे सौरमंडल के धूमकेतु-एस्टेरॉयड तक का अध्ययन किया। 2018 में इसका नाम मिशन के अगुवा वैज्ञानिक Neil Gehrels के सम्मान में रखा गया। आखिरी वैज्ञानिक ऑब्ज़र्वेशन 20 अक्टूबर 2026 को हुआ।

बचाने की कोशिश क्यों फेल हुई

Swift में अपनी कक्षा ऊपर उठाने के लिए कोई थ्रस्टर नहीं था। धरती के ऊपरी वायुमंडल की हल्की रगड़ (ड्रैग) उसे लॉन्च के समय से ही धीरे-धीरे नीचे खींच रही थी, और कक्षा जितनी नीचे आई, ये खिंचाव उतना ही तेज़ होता गया। इसे बचाने के लिए NASA ने सितंबर 2025 में अमेरिकी कंपनी Katalyst Space को करीब 3 करोड़ डॉलर (₹250 करोड़ से ज़्यादा) का कॉन्ट्रैक्ट दिया था। कंपनी का रोबोटिक यान LINK जुलाई 2026 में लॉन्च हुआ, लेकिन प्रोपल्शन और रिएक्शन व्हील की गड़बड़ी के चलते Swift को पकड़ ही नहीं पाया और 25 सितंबर को खुद धरती पर लौट आया।

आपके लिए इसका मतलब

इस कहानी से दो बातें निकलती हैं। पहली, अंतरिक्ष में पुराने लेकिन काम के यानों की “सर्विसिंग” यानी मरम्मत या धक्का देकर उम्र बढ़ाना अभी शुरुआती और जोखिम भरा काम है, NASA ने खुद इसे “हाई-रिस्क, हाई-रिवॉर्ड” मिशन कहा था। दूसरी, आने वाले सालों में भारत समेत कई देश सैटेलाइट डॉकिंग और सर्विसिंग पर काम कर रहे हैं, और Swift की नाकामी से मिली सीख उन सभी के काम आएगी। आम लोगों के लिए राहत की बात ये है कि ऐसे बेकाबू री-एंट्री वाले यानों से किसी के घायल होने का खतरा बेहद कम होता है, क्योंकि धरती का करीब 70% हिस्सा पानी है और बाकी में भी बड़ी आबादी वाला इलाका छोटा है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

NASA का Swift टेलीस्कोप कब और कहां गिरा?

4 नवंबर 2026 को 12:39 UTC (भारतीय समय करीब शाम 6:09 बजे) पर इंडोनेशिया के उत्तरी सुमात्रा के ऊपर इसने वायुमंडल में प्रवेश किया।

क्या इससे भारत को कोई खतरा था?

नहीं। री-एंट्री की जगह भारत के सबसे नज़दीकी हिस्से, ग्रेट निकोबार से भी करीब 650 किलोमीटर दूर थी।

Swift टेलीस्कोप क्या काम करता था?

ये गामा-रे बर्स्ट जैसे अचानक होने वाले अंतरिक्ष धमाकों को तुरंत पकड़कर बाकी वेधशालाओं को अलर्ट भेजता था, साथ ही सुपरनोवा, ब्लैक होल और धूमकेतुओं का अध्ययन करता था।

स्रोत: NASA Science, Space.com

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