दिवाली की रात आसमान में लाल, हरे, पीले और नीले रंग की जो चमक दिखती है, उसके पीछे कोई जादू नहीं बल्कि सीधी-सादी केमिस्ट्री है। पटाखों में रंग अलग-अलग धातुओं के सॉल्ट से आते हैं: स्ट्रॉन्शियम से लाल, बेरियम से हरा, सोडियम से पीला और कॉपर (तांबे) से नीला।
दिलचस्प बात यह है कि यही साइंस आपने स्कूल की केमिस्ट्री लैब में “फ्लेम टेस्ट” के नाम से पढ़ा होगा। आसमान में बस वही प्रयोग बहुत बड़े पैमाने पर होता है।
मुख्य बातें
- पटाखे में गर्मी से धातु के एटम के इलेक्ट्रॉन “उछलते” हैं और वापस लौटते वक्त खास रंग की रोशनी छोड़ते हैं।
- हर धातु का अपना तय रंग होता है, जैसे इंसान का फिंगरप्रिंट।
- नीला रंग बनाना सबसे मुश्किल माना जाता है, इसलिए नीले पटाखे कम दिखते हैं।
रंग बनता कैसे है? इलेक्ट्रॉन की “छलांग”
हर पटाखे में मोटे तौर पर तीन चीज़ें होती हैं: जलने के लिए फ्यूल, उसे तेज़ी से जलाने वाला ऑक्सीडाइज़र, और रंग देने वाले मेटल सॉल्ट। जलने पर इतनी गर्मी पैदा होती है कि धातु के एटम में मौजूद इलेक्ट्रॉन ऊर्जा लेकर ऊपर वाली “कक्षा” में चले जाते हैं।
लेकिन वहां वे ज़्यादा देर नहीं टिकते। अपनी पुरानी जगह पर लौटते वक्त वे अतिरिक्त ऊर्जा को रोशनी के रूप में छोड़ देते हैं। यह रोशनी एक तय वेवलेंथ (तरंगदैर्ध्य) की होती है, और वही वेवलेंथ हमारी आंखों को एक खास रंग के रूप में दिखती है। हर धातु के इलेक्ट्रॉन की “छलांग” अलग होती है, इसलिए हर धातु का रंग भी अलग होता है।
कौन-सी धातु, कौन-सा रंग
- लाल: स्ट्रॉन्शियम के कंपाउंड
- नारंगी: कैल्शियम के कंपाउंड
- पीला: सोडियम के कंपाउंड
- हरा: बेरियम के कंपाउंड
- नीला: कॉपर (तांबा) के कंपाउंड
- बैंगनी: स्ट्रॉन्शियम और कॉपर का मिक्स
सोडियम वाला पीला रंग आप रोज़ देखते हैं। पुरानी सड़कों पर लगी नारंगी-पीली स्ट्रीट लाइट (सोडियम वेपर लैंप) इसी सिद्धांत पर चमकती है। और खाना बनाते वक्त अगर नमक के कुछ दाने गैस की लौ पर गिर जाएं, तो लौ पल भर को पीली दिखती है, क्योंकि नमक में सोडियम होता है।
नीला रंग सबसे मुश्किल क्यों?
अगली बार पटाखे देखें तो गौर कीजिए, लाल और हरे के मुकाबले चटक नीला रंग बहुत कम दिखता है। अमेरिका की Purdue University के केमिस्ट पॉल ई. स्मिथ के मुताबिक नीला “the most difficult color to produce” है। इसकी दो वजहें हैं।
पहली, शाम का आसमान खुद हल्का नीला-सा होता है, इसलिए नीली रोशनी उसमें घुल जाती है। दूसरी, नीला रंग देने वाले कॉपर कंपाउंड को सही तापमान और बाकी केमिकल के साथ बहुत सटीक बैलेंस चाहिए। गर्मी ज़्यादा हुई तो रंग फीका या सफेद-सा हो जाता है, और उसे ज़्यादा चमकीला बनाने की कोशिश में वह धुला हुआ लगने लगता है।
आपके लिए इसका मतलब
यह जानकारी बच्चों को दिवाली पर साइंस समझाने का बढ़िया मौका है। फुलझड़ी के रंग देखकर उनसे पूछिए कि इसमें कौन-सी धातु होगी, केमिस्ट्री की किताब का एक चैप्टर खेल-खेल में समझ आ जाएगा। साथ ही यह भी याद रखें कि ये रंग देने वाले केमिकल जलकर धुआं और बारीक कण भी बनाते हैं, इसलिए पटाखे सीमित मात्रा में, खुली जगह पर और बड़ों की निगरानी में ही जलाएं। घर पर किसी भी तरह का केमिकल प्रयोग न करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
पटाखों में हरा रंग किससे बनता है?
हरा रंग आमतौर पर बेरियम के कंपाउंड से आता है। गर्म होने पर बेरियम के इलेक्ट्रॉन हरे रंग की वेवलेंथ वाली रोशनी छोड़ते हैं।
लाल रंग वाले पटाखों में कौन-सा केमिकल होता है?
लाल रंग के लिए स्ट्रॉन्शियम के कंपाउंड इस्तेमाल होते हैं, जैसे स्ट्रॉन्शियम कार्बोनेट।
फ्लेम टेस्ट क्या होता है?
यह स्कूल-कॉलेज लैब का एक प्रयोग है, जिसमें किसी सॉल्ट को लौ में रखकर उसके रंग से पता लगाते हैं कि उसमें कौन-सी धातु है। पटाखों के रंग भी इसी सिद्धांत पर बनते हैं।
स्रोत: The World (The Conversation), Texas A&M University at Galveston




